17 May, 2009
शोषण का हथियार है अंग्रेजी (डॉ राममनोहर लोहिया)
आज की दूसरी पुस्तक खोजते-खोजते "अभियान १२३" नामक एक पुस्तिका मिल गयी। यह इन्दौर के श्री दिनेश पुराणिक द्वारा संकलित है। इसमें बहुत से लेख संकलित हैं इनमें से निम्नलिखित संग्रह मुझे बहुत अच्छा लगा। कितना आश्चर्य का विषय है कि इसमें कही गयी बाते (कोई पचास वर्ष पहले) आज सत्य सिद्ध हुई हैं या अब भी प्रासंगिक हैं।
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#अंग्रेजी, हिन्दुस्तान को ज्यादा नुकसान इसलिये नहीं पहुँचा रही है कि वह विदेशी है, बल्कि इसलिये कि भारतीय प्रसंग में वह सामन्ती है। आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत छोटा सा अल्पमत ही अंग्रेजी में ऐसी योग्यता हासिल कर पाता है कि वह इसे सत्ता या स्वार्थ के लिये इस्तेमाल करता है। इस छोटे से अल्पमत के हाथ में विशाल जनसमुदाय पर अधिकार कर शोषण करने का अधिकार है - अंग्रेजी ।
#अंग्रेजी, विश्व-भाषा नहीं है। फ्रेंच और स्पेनी भाषाएँ पहले से ही हैं और रूसी पर उठ रही है।दुनिया की ३ अरब से ज्यादा आबादी में तीस या पैतींस करोड़ यानी करीब १० में से १ भी इस भाषा को समान्य रूप से नहीं जानते। संस्कृत, पालि, अरबी, यूनानी, या लातिनी लगता था अपने समय में विश्वभाषा बन जायेंगी; किन्तु वे कभी नही बन सकीं। उसी तरह अंग्रेजी भी उतार पर आ गयी है, विशेषत: रूसी विस्तार के कारण। अगर कभी कोई विश्वभाषा बनी तो आज की कोई भाषा नहीं बनेगी।
#अंग्रेजी अपने क्षेत्र में लावण्यमयी भाषा है। फ्रेंच जितनी चरपरी नहीं, ना ही जर्मन जितनी गहरी; पर ज्यादा परिमित परिग्राही और उदार है। जब हम "अंग्रेजी हटाओ" कहते हैं तो हम यह बिल्कुल नहीं चाहते कि उसे इंग्लिस्तान या अमेरिका से हटाया जाय, और न ही हिन्दुस्तानी कालेजों से बशर्ते वह ऐच्छिक हो। पुस्तकालयों से उसे हटाने का सवाल तो उठता ही नहीं।
#दुनिया में सिर्फ हिन्दुस्तान ही एक ऐसा सभ्य देश है (यह मानकर कि हम सभ्य हैं) जिसके जीवन का पुराना ढर्रा कभी खत्म नहीं होना चाहता। जो अपनी विधायिकाएँ, अदालतें, प्रयोगशालेँ, कारखाने, तार, रेलवे, और लगभग सभी सरकारी और दूसरे सार्वजनिक काम उस भाषा मेंकरता है जिसे ९९% लोग समझते तक नहीं। वास्तव में दुनिया में दूसरा कोई सभ्य देश अथवा असभ्य देश नहीं है जो ऐसा करता है। हिन्दुस्तान को छोड़कर सर्वजनिक काम केलिये जिस किसी देश ने अंग्रेजीको अपनाया है वह तभी जब उसकी अपनी भाषाएं प्राय: समाप्त हो गयीं हों; और चाहे जितने मिश्रित रूप मेंही क्योंन हो लेकिन अंग्रेजी उनके बोलचाल की भाषा बन गयी हो। "अंग्रेजी हटाओ" आन्दोलन अपने देश के सार्वजनिक जीवन या सामूहिक जीवन से अंग्रेजी को हटाना चाहता है। यहाँ अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर अंग्रेजी नहीं रह सकती। अतिरिक्त मेधा प्राप्त करने केलिये उसे अध्ययन का एक ऐच्छिक विषय रखा जा सकता है। सभी जानते हैं कि फ्रांस या जर्मनी में शेक्सपियर के साहित्य के महत्वपूर्ण विवेचक इसलिये पैदा हुए कि उन्होने शेक्सपियर का अंग्रेजी पाठ तो पढ़ा पर उसका विवेचन किया अपनी भाषा में। हिन्दुस्तान में शेक्सपियर साहित्य के उनके सैकड़ोंया हजारों गुना विद्वान हुए पर कोई भी महत्वपूर्ण नहीं हुआ, क्योंकि वे अभिव्यक्ति और मेधा का माध्यम भी अंग्रेजी ही रखते हैं।
#कोई एक हजार वर्ष पहले हिन्दुस्तान में मौलिक चिन्तन समाप्त हो गया। अब तक उसे पुन: जीवित नही किया जा सका है। इसका एक बड़ा कारन है अंग्रेजी की जकड़न। अगर कुछ अच्छे वैज्ञानिक, वह भी कोई बहुत कम और सचमुच कोई बहुत बड़े नहीं, हाल के दशकों में पैदा हुए हों तो इसलिये कि वैज्ञानिकों का भाषा से उतना वास्ता नहीं पड़ता जितना कि संख्या और प्रतीकों से पड़ता है। सामाजिक शास्त्रों और दर्शन में तो बिल्कुल शून्य है। मेरा मतलब उनके विचारणात्मक अंग से नहीं बल्कि आधार से है। भारतीय विद्वान जितना समय चिन्तन की गहराई और विन्यास मेंलगाते हैं, तो अगर ज्यादा नहीं तो कम से कम उतना ही समय उच्चारण, मुहावरे और लच्छेदारी में देते हैं। यह तथ्य उस शून्य का कारण है। मंच पर क्षणभंगुर गर्व के साथ चौकड़ियाँ भरने वाले स्कूल-विद्यार्थी से लेकर विद्वान तक के ज्ञान को अभिशाप लग गया है। भारतीय चिंतन का अभिप्रेत विषय-ज्ञान नहीं, बल्कि मुहावरेदारी और लच्छेदारी बन गया है।
#औद्योगीकरण करने के लिये हिन्दुस्तान को १० लाख इंजिनियरों और वैज्ञानिकों तथा एक करोड़ मिस्त्रियों और कारीगरों के फौज की जरूरत है। जो यह सोचता है कि यह फौज अंग्रेजी के माध्यम से बनायी जा सकती है वह या तो धूर्त है या मूर्ख। उद्योगीकरण के क्षेत्र में जापान, चीन या रूमानिया ने जो इतनी प्रगति की है, उसका उनके अच्छे आर्थिक इंतजाम के जितना ही बड़ा कारण यह भी है कि उन्होने जनभाषा के द्वारा ही अपना सब काम किया। केवल व्यक्ति के लिये ही नहीं, बल्कि समाज के लिये भी, मन और पेट का एक दूसरे पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। हमारे युग मेंयह बहुत दुख की बात है कि भारत की वर्तमान विचारधारा में मन एवं पेट को बहुत ही विकृत ढंग से विच्छिन्न कर दिया गया है। किसी देश के मन को साथ ही साथ ठीक करने की कोशिश किये बिना कोई उसके पेट या आर्थिक अवस्था को ठीक नहीं कर सकता।
#हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषाओं की सामर्थ्य का सवाल बिलकुल नहीं उठना चाहिये। अगर वे असमर्थ हैं तो इस्तेमाल के जरिये ही उन्हें समर्थ बनाया जा सकता है। पारिभाषिक शब्दावली निश्चित करने वाली या कोष और पाठ्यपुस्तक बनाने वाली कमेटियों के जरिये कोई भाषा समर्थ नहीं बनती। प्रयोगशालाओं, अदालतों, स्कूलों आदि जगहों में इस्तेमाल के द्वारा ही कोई भाषा सक्षम बनती है। पहले-पहल उसके इस्तेमाल से कुछ गड़बड़ हो सकती है, पर सामन्ती या अल्पमती भाषा से जो मुसीबत होती है , हर हालत में उससे ज्यादा नहीं होगी। पहले भाषा की स्थापना होती है और फिर उसमें निखार आता है। इस प्रक्रिया को उलट देने से भारत ने अपने-आप को मूर्ख बना डाला है। इस उल्टी प्रक्रिया से भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के जितना निखार कभी नहीं आ सकता। और इसलिये उनकी स्थापना का सवाल कभी उठेगा ही नहीं। जबतक मूलभूत उपचार नहींकिया जाता, हमेशा एक तरफ बंगला, तमिल या हिन्दी और दूसरी तरफ अंग्रेजी के बीच विकास का अन्तर रहेगा।
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14 comments:
बहुत बढ़िया तथा खोजपरक लेख.
दीपक भारतदीप
बिलकुल सही विश्लेषण. हम आपका समर्थन करते हैं.
यही सत्य है। और, हैरत की बात है कि हिन्दी की कमाई खानेवाले हमारे हिन्दीप्रेमी इस सत्य से आम जनता को रूबरू कराने की कोशिश नहीं करते। यदि कोई कहता है कि उसे हिन्दी से लगाव है और वह भारतीय संविधान की दोहरी राजभाषा की नीति के खिलाफ खुलकर नहीं आता तो वह पाखंडी व धोखेबाज है।
हम तो अपने छोटे कदम से प्रसन्न हैं। किसी बौद्धिक पचड़े में नहीं पड़ते।
आपका ई-मेल ढूंढ रहा था लेकिन नहीं मिला. कृपया मुझे बातें की हिंदी विकिपीडिया में बाहरी कडियाँ जोड़ने का विवरण कहाँ मिलेगा. मैं अपने ब्लौग के कुछ लेख व् ज्ञान-विज्ञानं की कुछ सामग्री भी हिंदी विकिपीडिया पर डालना चाहता हूँ. आशा है आप सहायता करेंगे. मुझे the.mishnish (at) gmail.com पर मेल करें.
AApkee bebaak tippnee ke liye shukriya. Hindi ke baare men badhiya vishleshanaatmak lekh ke liye badhaai
सही विश्लेषण!!!
बढ़िया तथा खोजपरक लेख!!
लोहिया जी की दूर दृष्टि समझी जा सकती है . आज भी बात वही है .
अनुनाद जी जन्म दिन की बधाई .
annunad ji, kripya mujhe koi esa offline chankya font ka unicode convertor hai to please mujhe guide karien
बहुत बढ़िया आलेख।आपको यह जानकर खुशी होगी कि यहां अर्जेन्टीना में लोग हिन्दी और संस्कृत सीख रहे हैं।और अफ़सोस की बात है हम अंग्रेजी के पीछे ऐसे अंधाधुन भाग रहे है कि अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति कुछ अलग नजरिया हो गया है।भाषायें तो माध्यम है सभी भाषायें सीखनी चाहिये पर अपनी मातृभाषा का अलग ही महत्व है। इसी संदर्भ में आपने मेरे ब्लाग जीवनसफ़र में हिन्दी विकि पर कुछ लेखों का योगदान करने के बारे में लिखा हैं।इस कार्य से मुझे खुशी होगी पर कृपया इस संदर्भ में मुझे sangeetik@gmail.com पर किस तरह के लेख लिखना है,इस विषय में जानकारी दीजियेगा।
बहुत अच्छा लेख।
यहां देने के लिए हृदय से आभार।
अननुनादजी, यह बात जितनी सच है कि आप द्वारा हिंदी के उत्कर्ष के लिए किए जा रहे योगदान को जमाना याद रखेगा. उतना ही यह भी सच है कि हिंदी जानने वाले की कोई कदर इस देश में नहीं बची है. क्योंकि हिंदी जानने की पहचान करने का जिम्मा भी अंग्रेजीपरस्त लोगों के हाथों में है. बिना अंग्रेजी लोगों का अब इस देश में उद्धार हो पाना संभव नहीं रह गया है. आप द्वारा हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए की जारही कोशिशों के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं.
अननुनादजी, यह बात जितनी सच है कि आप द्वारा हिंदी के उत्कर्ष के लिए किए जा रहे योगदान को जमाना याद रखेगा. उतना ही यह भी सच है कि हिंदी जानने वाले की कोई कदर इस देश में नहीं बची है. क्योंकि हिंदी जानने की पहचान करने का जिम्मा भी अंग्रेजीपरस्त लोगों के हाथों में है. बिना अंग्रेजी लोगों का अब इस देश में उद्धार हो पाना संभव नहीं रह गया है. आप द्वारा हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए की जारही कोशिशों के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं.
अनुनाद जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद की आपने इन विचारों से हम सब को अवगत कराया |
कुलदीप शर्मा जी ने अपनी टिपण्णी मैं लिखा है की - " कोई कदर इस देश में नहीं बची है. " बात सच भी है पर इसके लिए हम हिंदी भाषी ही ज्यादा जिम्मेदार हैं | यदि कोई ठग आपको बार-बार मुर्ख बनता रहे तो गलती ठग से ज्यादा अपनी है | ज्यादातर समय हम हिंदीभाषी संस्कारहीन अंग्रेजीदा लोगों को अपने ऊपर हावी होने दे देते हैं और वो बाद मैं वो हमारे सर चढ़ कर नाचने लगते हैं | इस गुलामी वाली मानसिकता से ऊपर उठ कर ही हिंदी का विकाश संभव है |
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